सिख धर्म में अरदास सिर्फ कुछ पंक्तियों का मेल नहीं है। सच कहूँ तो, यह आत्मा की वह पुकार है जो सीधे अकाल पुरख (परमात्मा) के चरणों में पहुँचती है। जब एक सिख अपने हाथ जोड़कर, सिर झुकाकर खड़ा होता है, तो वह पूरी दुनिया से कटकर उस निराकार शक्ति के साथ जुड़ जाता है। अरदास का मतलब ही है 'याचना' या 'प्रार्थना'।
कई बार लोग सोचते हैं कि क्या Ardas Sahib in Hindi पढ़ने से वही फल मिलेगा जो गुरुमुखी में मिलता है? बिल्कुल। भावना प्रधान है, भाषा नहीं।
आखिर अरदास साहिब का इतिहास क्या है?
हैरानी की बात यह है कि पूरी अरदास किसी एक गुरु साहिब ने एक साथ नहीं लिखी थी। इसकी शुरुआत दशम पिता गुरु गोबिंद सिंह जी ने की थी। उन्होंने 'चंडी दी वार' की शुरुआती पंक्तियों में प्रथम नौ गुरुओं का स्मरण किया। बाद में, जैसे-जैसे सिख इतिहास आगे बढ़ा, इसमें पंथ के बलिदानों को जोड़ा गया।
भाई मनी सिंह जी जैसे महान विद्वानों ने इसमें सिखों के उन कष्टों का जिक्र जोड़ा जो उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए सहे। चाहे वह बंद-बंद कटाना हो या खोपड़ियाँ उतरवाना, यह सब अरदास का हिस्सा बना ताकि हम अपनी जड़ों को कभी न भूलें।
Ardas Sahib in Hindi: यहाँ पढ़ें पूरी अरदास और उसका अर्थ
यहाँ अरदास का वह रूप दिया गया है जिसे हम आमतौर पर गुरुद्वारों में सुनते हैं। इसे हिंदी में पढ़ने से आपको इसके हर शब्द की गहराई समझ आएगी।
इक ओंकार वाहेगुरु जी की फतेह। वार श्री भगौती जी की पातशाही दसवीं।।
(एक ईश्वर की जय हो। श्री भगौती जी की वार, दसवें गुरु द्वारा रचित।)
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प्रिथम भगौती सिमर कै गुरु नानक लईं धिआइ।
(सबसे पहले उस अकाल पुरख की शक्ति को याद करें, फिर गुरु नानक देव जी का ध्यान करें।)
फिर अंगद गुर ते अमरदासु रामदासै होईं सहाइ।
(फिर गुरु अंगद देव जी, गुरु अमर दास जी और गुरु राम दास जी को याद करें जो हमेशा सहायक रहे हैं।)
अरजन हरगोबिंद नो सिमरौ स्री हरिराइ।
(गुरु अर्जन देव जी, गुरु हरगोबिंद साहिब और श्री गुरु हर राय जी का स्मरण करें।)
स्री हरिक्रिसन धिआईऐ जिसु डिट्ठै सबि दुखि जाइ।
(श्री गुरु हरकिशन जी का ध्यान करें, जिनके दर्शन मात्र से सारे दुःख दूर हो जाते हैं।)
तेग बहादुर सिमरिऐ घर नउ निधि आवै धाइ।
(गुरु तेग बहादुर जी को याद करें, जिनसे घर में नौ निधियाँ (सुख-संपत्ति) चली आती हैं।)
सभ थाईं होइ सहाइ।। दसवां पातशाह स्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी! सभ थाईं होइ सहाइ।
(वे सब जगह हमारी सहायता करें। दसवें गुरु, श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी! आप भी सब जगह सहायक हों।)
दसां पातशाहियां दी जोत स्री गुरु ग्रंथ साहिब जी दे पाठ दीदार दा धिआन धर के बोलो जी वाहेगुरु!
(दसों गुरुओं की ज्योति, श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के पाठ और दर्शन का ध्यान धर के कहो - वाहेगुरु!)
पाँच प्यारे और चालीस मुक्ते: हमारा गौरवशाली इतिहास
इसके बाद अरदास में उन महान आत्माओं को याद किया जाता है जिन्होंने धर्म के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया।
- पाँच प्यारे: जिन्होंने गुरु साहिब के एक बुलावे पर अपना शीश भेंट कर दिया।
- चार साहिबजादे: गुरु गोबिंद सिंह जी के वे बहादुर बेटे जिन्होंने छोटी उम्र में शहादत पाई।
- चालीस मुक्ते: जो पहले साथ छोड़ गए थे, पर बाद में माई भागो के नेतृत्व में खिदराना की जंग में शहीद होकर गुरु के चरणों में वापस आए।
जब हम कहते हैं "तिन्हां दी कमाई दा ध्यान धर के बोलो जी वाहेगुरु", तो हम असल में उनकी तपस्या से ऊर्जा मांग रहे होते हैं।
अरदास करने का सही तरीका (Sikh Rehat Maryada)
क्या आप जानते हैं कि अरदास के वक्त खड़ा होना क्यों जरूरी है? यह समर्पण का प्रतीक है। जैसे एक सिपाही अपने राजा के सामने सावधान खड़ा होता है, वैसे ही हम उस मालिक के सामने खड़े होते हैं।
- तन और मन की शुद्धि: हाथ-पैर धोकर और सिर ढंककर ही अरदास में शामिल हों।
- एकाग्रता: आँखें बंद कर लें ताकि बाहरी दुनिया का शोर आपके ध्यान में खलल न डाले।
- सामूहिक और व्यक्तिगत: गुरुद्वारे में एक ग्रंथी सिंह अरदास करते हैं और पूरी संगत 'वाहेगुरु' कहकर सहमति देती है। लेकिन घर पर आप अकेले भी इसे कर सकते हैं।
- हुकमनामा: अरदास के बाद गुरु ग्रंथ साहिब से जो पहला शब्द आता है, उसे वाहेगुरु का आदेश माना जाता है।
अरदास की शक्ति: क्यों यह आज भी प्रासंगिक है?
ईमानदारी से कहूँ तो, आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अक्सर अकेला महसूस करते हैं। अरदास हमें यकीन दिलाती है कि कोई है जो हमें देख रहा है। यह सिर्फ माँगने का जरिया नहीं है, बल्कि 'शुक्राना' करने का तरीका भी है।
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सिख धर्म में एक बहुत ही सुंदर वाक्य है: "नाणक नाम चढ़दी कला, तेरे भाणे सरबत दा भला"। इसका मतलब है कि गुरु नानक के नाम की हमेशा चढ़ती कला (उन्नति) रहे और परमात्मा की रजा में सबका भला हो। यह स्वार्थ से ऊपर उठकर पूरी मानवता के लिए मांगी गई दुआ है।
कुछ खास बातें जो शायद आपको न पता हों
अरदास में 'देग तेग फतेह' का जिक्र आता है। 'देग' का मतलब है लंगर (सेवा) और 'तेग' का मतलब है कृपाण (शक्ति/सुरक्षा)। यानी जब तक हम दूसरों को खिला रहे हैं और मजलूमों की रक्षा कर रहे हैं, हमारी जीत निश्चित है।
साथ ही, अरदास में उन गुरुद्वारों का भी जिक्र आता है जिनसे सिखों को अलग कर दिया गया है, जैसे ननकाना साहिब। यह एक कौम की अपनी विरासत के प्रति तड़प को दर्शाता है।
अब आगे क्या?
अगर आप अपने जीवन में शांति और साहस महसूस करना चाहते हैं, तो रोज सुबह या शाम Ardas Sahib in Hindi का पाठ शुरू करें। जरूरी नहीं कि आप लंबे मंत्र पढ़ें; बस सच्चे दिल से गुरु साहिब के सामने अपनी बात रखें।
आप आज से ही "सरबत दा भला" (सबकी भलाई) की भावना के साथ अपने दिन की शुरुआत कर सकते हैं। यह छोटा सा कदम आपके नजरिए को पूरी तरह बदल देगा।